कथित डकैती की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किए गए सात आरोपी बरी, अदालत ने पुलिस जांच पर उठाए सवाल

हरिद्वार। हरकी पैड़ी क्षेत्र में कथित डकैती की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किए गए सात युवकों को अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। प्रथम अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश हरिद्वार की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने पुलिस की कार्रवाई और गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास पाए, जिसके चलते सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता अनुराग श्रीकुंज व युवा अधिवक्ता शोपीन चौधरी की मजबूत पैरवी के चलते सातों लोगों को अदालत से इंसाफ मिल गया।

अदालत से बरी किए गए आरोपियों में रवि पुत्र उमेश सिंह निवासी महरौली दिल्ली, राजीव पुत्र रमेश निवासी बदायूं उत्तर प्रदेश, कृष्णा पुत्र प्रवीण कुमार निवासी मेरठ, रवि पुत्र तेजराम निवासी फर्रुखाबाद, जितेंद्र पुत्र मक्का निवासी कन्नौज, रजत गोस्वामी पुत्र मनोज गोस्वामी निवासी जोगियामंडी हरिद्वार और विपिन पुत्र तेजराम निवासी फर्रुखाबाद शामिल हैं।

मामला जून 2024 का है। पुलिस के अनुसार हरकी पैड़ी क्षेत्र स्थित जोगियामंडी के एक खंडहरनुमा निर्माणाधीन मकान में कुछ युवक डकैती की योजना बना रहे थे। मुखबिर की सूचना पर पुलिस टीम ने मौके पर दबिश देकर सात आरोपियों को गिरफ्तार करने का दावा किया था। पुलिस ने आरोपियों के पास से हथौड़ी, प्लास, पेचकस और अन्य औजार बरामद होने की बात कही थी। इसके बाद सभी के खिलाफ आईपीसी की धारा 399 और 402 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।

कोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने चार पुलिसकर्मियों को गवाह के रूप में पेश किया, लेकिन अदालत ने पाया कि घटना के समय, गिरफ्तारी, बरामदगी और मौके की परिस्थितियों को लेकर गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। अदालत ने यह भी माना कि कथित बरामद औजार सामान्य बाजार में आसानी से उपलब्ध होने वाले उपकरण हैं और केवल इनके मिलने भर से डकैती की तैयारी साबित नहीं होती।

फैसले में अदालत ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में अभियोजन को आरोप बिना किसी उचित संदेह के साबित करने होते हैं, लेकिन इस मामले में पुलिस ऐसा करने में सफल नहीं हो सकी। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि केवल पुलिसकर्मियों के बयान पर्याप्त नहीं माने जा सकते, जब तक कि घटनाक्रम का समर्थन करने वाले स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य मौजूद न हों। करीब दो वर्ष तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने सभी सात आरोपियों को बाइज्जत बरी करने का आदेश दिया।

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