हमज़ा राव।
देहरादून/हरिद्वार। उत्तराखंड के बहुचर्चित हरिद्वार नगर निगम भूमि खरीद घोटाले में शासन ने अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई करते हुए तत्कालीन नगर आयुक्त हरिद्वार वरुण चौधरी को सेवा से बर्खास्त किए जाने की संस्तुति की है। वहीं तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह को अपने पदीय दायित्वों के निर्वहन में गंभीर लापरवाही का दोषी मानते हुए उनके खिलाफ भी कड़ी विभागीय कार्रवाई की संस्तुति केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेजी गई है। इसके अलावा तत्कालीन एसडीएम अजयवीर सिंह के विरुद्ध परनिंदा प्रविष्टि दर्ज करने तथा उनकी तीन वेतनवृद्धियां रोकने के निर्देश दिए गए हैं।
यह मामला हरिद्वार नगर निगम द्वारा ग्राम सराय क्षेत्र में लगभग 33 से 35 बीघा भूमि की खरीद से जुड़ा है। आरोप है कि जिस भूमि का बाजार मूल्य करीब 14 से 18 करोड़ रुपये के बीच आंका जा रहा था, उसे नगर निगम द्वारा लगभग 54 करोड़ रुपये में खरीदा गया। मामले के सामने आने के बाद पूरे प्रदेश में राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया था।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शुरुआती जांच में अनियमितताओं के संकेत मिलने पर तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह, नगर आयुक्त वरुण चौधरी समेत कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया था। बाद में वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों से विशेष जांच कराई गई, जिसमें भूमि उपयोग परिवर्तन, मूल्यांकन, खरीद प्रक्रिया तथा प्रशासनिक स्वीकृतियों में गंभीर खामियां सामने आईं। जांच रिपोर्ट में प्रथम दृष्टया तत्कालीन डीएम कर्मेंद्र सिंह, नगर आयुक्त वरुण चौधरी और एसडीएम अजयवीर सिंह की भूमिका संदिग्ध पाई गई थी।
जांच में यह भी सामने आया कि भूमि खरीद के दौरान निर्धारित नियमों और शर्तों का पूर्ण पालन नहीं किया गया तथा राजस्व अभिलेखों और मूल्यांकन प्रक्रिया में भी कई सवाल खड़े हुए। शासन ने इसके बाद विस्तृत विभागीय जांच और विशेष ऑडिट के आदेश दिए थे। पूर्व नगर आयुक्त के कार्यकाल का विशेष ऑडिट भी कराया गया, जिसमें भूमि खरीद से जुड़े कई पहलुओं की जांच की गई।
इस प्रकरण को उत्तराखंड के सबसे बड़े प्रशासनिक घोटालों में से एक माना जा रहा है क्योंकि पहली बार किसी भूमि खरीद मामले में एक साथ जिलाधिकारी, नगर आयुक्त और एसडीएम स्तर के अधिकारियों पर इतनी बड़ी कार्रवाई हुई। हाल ही में केंद्र सरकार ने भी कर्मेंद्र सिंह और वरुण चौधरी के निलंबन की अवधि छह माह के लिए बढ़ाने को मंजूरी दी थी, जिससे साफ संकेत मिल गए थे कि जांच एजेंसियों और शासन को मामले में गंभीर अनियमितताओं के पर्याप्त आधार मिले हैं।
विजिलेंस जांच में आपराधिक षड्यंत्र और धोखाधड़ी के आरोप
विजिलेंस जांच में हरिद्वार नगर निगम भूमि खरीद प्रकरण में प्रथम दृष्टया गंभीर अनियमितताओं के साथ-साथ आपराधिक षड्यंत्र और धोखाधड़ी के तत्व भी सामने आए हैं। जांच रिपोर्ट के अनुसार भूमि क्रय प्रक्रिया के दौरान नियमों को दरकिनार कर नगर निगम को करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया। जांच में कई अधिकारियों, कर्मचारियों और भूमि विक्रेताओं की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। राज्य सतर्कता समिति, जिसकी अध्यक्षता मुख्य सचिव करते हैं, ने जांच रिपोर्ट का परीक्षण करने के बाद संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों एवं भूमि विक्रेताओं के खिलाफ अभियोग दर्ज करने की संस्तुति की थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस संस्तुति को मंजूरी देते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता साफ कर दिया।
इन अधिकारियों पर दर्ज होगा मुकदमा
विजिलेंस जांच के आधार पर जिन अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ अभियोग दर्ज किए जाने की संस्तुति की गई है, उनमें तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी, तत्कालीन सहायक नगर आयुक्त रविन्द्र कुमार दयाल, तत्कालीन कर अधीक्षक लक्ष्मीकांत भट्ट, तत्कालीन सहायक अभियंता एवं प्रभारी अधिशासी अभियंता आनंद सिंह मिश्राण, तत्कालीन संपत्ति लिपिक वेदपाल तथा तत्कालीन मानचित्रकार दिनेश काण्डपाल शामिल हैं।
भूमि विक्रेताओं पर भी कसेगा शिकंजा
जांच में केवल अधिकारियों और कर्मचारियों की ही नहीं, बल्कि भूमि विक्रेताओं की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है। शासन ने भूमि विक्रेता सुमन देवी, जितेंद्र कुमार, अभिषेक यादव तथा सुजीत कुमार सिंह के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज करने की मंजूरी दे दी है। इससे स्पष्ट है कि सरकार इस मामले में केवल विभागीय कार्रवाई तक सीमित न रहकर आपराधिक जवाबदेही भी तय करने के पक्ष में है।
